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    शेषशय्या पर आसीन भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी का प्रादुर्भाव।।

     


                                 शेषशय्या पर आसीन भगवान् विष्णु के 
                                   नाभि कमल से ब्रह्माजी का प्रादुर्भाव


    ऋषियों ने यह प्रश्न किया कि प्राचीनकालमें पाद्यकल्पमें ब्रह्माजी कमलसे किस प्रकार उत्पन्न हुए और पुरुषोत्तम विष्णुने उन ब्रह्मा के साथ शिवका दर्शन कैसे किया ?

     सूतजी=कहते हैं कि प्रलयके समय चारों ओर जल ही जल तथा घोर घनीभूत अन्धकार व्याप्त था।

     उस प्रलय सागरके मध्य शंख, चक्र, गदा धारण किये सर्वात्मा नारायण लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु हजार फणोंसे सुशोभित शेषनागके छायायुक्त फणरूप शेषशव्यापर शयन कर रहे थे। वहाँ शयन कर रहे विष्णुने अपनी क्रीडाके निमित्त अत्यन्त ऊँचे वज्रदण्डसे युक्त कमलको, जो शतयोजन विस्तीर्ण तथा प्रखर सूर्यके समान था, अपनी नाभिसे लीलापूर्वक उत्पन्न किया। 


    उसी समय चार मुखवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माने सुन्दर तथा सुगन्धित कमलके साथ विष्णुको खेलते हुए देखा। तत्पश्चात् उनके सन्निकट पहुँचकर ब्रह्माजीने विस्मयपूर्वक विनम्र भावसे उनसे पूछा- आप कौन हैं तथा इस समुद्रके मध्य आश्रय लेकर क्यों सो रहे हैं? भगवान् विष्णुने उनके। 


    प्रश्न के उत्तर में कहा कि मैं प्रत्येक कल्पमें इसी स्थानका ■ आश्रय लेकर शयन करता हूँ। स्वर्गलोक, आकाश, पृथ्वी ■ तथा भुवर्लोक-इन सबका परमपद मैं ही हूँ। पितामह ब्रह्मा शिवकी मायासे मोहित होकर विष्णुदेवसे कहने लगे, जिस प्रकार आप इस जगत्के आदिकर्ता तथा प्रजापति हैं, वैसे ही मैं भी हूँ। 


    ब्रह्माजीका यह विस्मयकारी वचन सुनकर महायोगी भगवान् विष्णु कौतूहलवश ब्रह्माके मुखमें प्रविष्ट हो गये। ब्रह्माजीके उदरमें अठारह द्वीपों, सभी समुद्रों, समस्त पर्वतों, सभी स्थावर जंगम पदार्थ देखकर भगवान् विष्णु अत्यन्त विस्मित हुए तथा उसका अन्त न पाकर जगदाधार नारायण उन ब्रह्माके मुखमार्गसे बाहर निकलकर उनसे कहने लगे- मैं आपके उदरका अन्त नहीं देख पाया।


     हे सुरश्रेष्ठ! मैं भी इसी तरह भगवान् हूँ। अब आप भी मेरे शाश्वत उदरमें प्रवेश करके अनुपम लोकोंका दर्शन करें। सत्यपराक्रमवाले ब्रह्माजीने विष्णुके उदरमें प्रवेश करके वहाँ स्थित उन्हीं सब लोकोंको देखा और उसमें बहुत भ्रमण करने के उपरान्त भी वे विष्णुदेवके उदरका अन्त नहीं पा सके। 


    तत्पश्चात् सभी द्वारोंको बन्द देखकर पितामहने अत्यन्त सूक्ष्मरूप धारण करके नाभिमार्गमें पद्मसूत्र (कमलनाल) के सहारे कमलसे स्वयंको बाहर निकाला तथा जगद्योनि स्वयम्भू ब्रह्मा कमलके ऊपर शोभित हुए।समुद्रके मध्य ब्रह्मा और विष्णुमें अनेक प्रकारसे


    संघर्ष एवं विवाद चल रहा था, उसी समय शूलपाणि महादेव कहाँसे वहाँ पहुँच गये। उनके चरणोंके प्रहार से समुद्रजलकी बड़ी-बड़ी बूँदें आकाशतक पहुँचने लगीं तथा कभी अत्यन्त गर्म और कभी अत्यन्त शीतल वायुसे वह कमल अत्यधिक कम्पायमान होने लगा। 


    इससे कमलपर स्थित ब्रह्मा भी विचलित होने लगे। भगवान् विष्णु सोचने लगे कि मेरी नाभिमें इस कौन-से जीवने स्थान बना लिया है ? विष्णुने ब्रह्मासे कहा कि आपको यहाँ कमलमें व्याकुलता क्यों हो रही है? इसका कारण मुझे यथार्थरूपसे बताइये। 


    वेदनिधि ब्रह्माने उत्तर दिया मैं आपकी इच्छासे पूर्वकालमें आपके उदरमें प्रविष्ट हुआ था, जिस प्रकार प्रथम मेरे उदरमें प्रवेश करके आपने सभी लोकोंको देखा था, उसी प्रकार मैंने भीआपके उदरमें उन सम्पूर्ण लोकोंका दर्शन किया। 

    इसके बाद ईर्ष्याभावसे युक्त होकर आपने मुझे वशमें करने की इच्छासे चारों ओरसे सभी इन्द्रियद्वार बन्द कर लिये।तदनन्तर में अपने तेजके प्रभावसे अति सूक्ष्म रूप धारणकर आपके नाभिस्थलसे कमलनालके सहारे बाहर निकल आया। 


    इसके लिये आपके मनमें थोड़ा भी विषाद नहीं होना चाहिये। ब्रह्माकी मधुर वाणी सुनकर भगवान् विष्णुने ईर्ष्यारिहित होकर उनसे कहा- मैंने इसके लिये कोई प्रयत्न नहीं किया था।


     आपको बोध करानेकी इच्छासे क्रीडापूर्वक दैवयोगसे यों ही अपने सभी द्वार शीघ्र ही बन्द कर लिये थे। इसे आप कुछ भी अन्यथा न समझें।


     हे प्रभो। मेरे द्वारा वहन किये जाते हुए आप कमलसे उतर आइये; क्योंकि अत्यन्त गुरुतर तथा तेजसम्पन्न होनेके कारण मैं आपका भार सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ, तब ब्रह्माने प्रसन्न होकर कहा कि आप मुझसे वरदान माँगिये। इसपर विष्णु कहने लगे- हे प्रभो! आप कमलसे नीचे उतर आइये और यही वर दीजिये कि आप मेरे पुत्र बनेंगे। 


    आजसे आप सात लोकोंके स्वामी तथा पद्मयोनि नामसे लोकमें प्रसिद्ध हों। तत्पश्चात् विष्णुसे 'ऐसा ही होगा' कहकर ब्रह्माजी प्रसन्नतापूर्वक वर प्रदान करते हुए द्वेषरहित हो गये तथा अद्भुत हृदयवाले शिवको अतिसमीप आते हुए देखकर ब्रह्माने भगवान् विष्णुसे कहा- हे विष्णो। 


    महान् कान्तिसम्पन्न तथा तेजपुंजसे युक्त यह कौन प्राणी सभी दिशाओं तथा आकाशको व्याप्त करके इधर ही चला आ रहा है? ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर भगवान् विष्णुने उनसे कहा- आदि-अन्तरहित पार्वतीनाथ शिव आ रहे हैं। हम दोनों मिलकर स्तोत्र के द्वारा इन वृषभध्वज महादेवकी प्रार्थना करें।


    तत्पश्चात् भगवान् विष्णुसे ब्रह्माजीने कुपित होकर कहा कि लोकोंके स्वामी तथा सर्वव्यापी स्वयं अपने आपको एवं जगत्के कर्ता मुझ सनातन ब्रह्माको क्या आप नहीं जानते ? हम दोनोंसे बढ़कर यह शंकर नामवाला कौन है? उन ब्रह्माके क्रोधयुक्त वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले- हे प्रभो! महात्मा शिवके लिये ऐसा निन्दित वचन मत बोलिये। 


    ये महादेव साक्षात् धर्मस्वरूप है। ये शिव ही इस जगत्‌के कारण हैं। एकमात्र ज्योतिके रूप में जगत्को प्रकाशित कर रहे हैं। ये शिव बीजवान है, आप ब्रह्मा बोज हैं तथा सनातनरूप में विष्णु योनि हूँ।


    विष्णुके इस प्रकार कहनेपर विश्वात्मा ब्रह्माने उनसे पूछा- आप योनि, मैं बीज तथा महेश्वर शिव बोजवान किस प्रकार हैं? आप मेरे सूक्ष्म सन्देहका निवारण करने की कृपा करें। भगवान् विष्णुने उनके इस पर निगूड प्रश्नका उत्तर दिया- इन महादेवसे बढ़कर अन्य कोई भी गूढ तत्त्व नहीं है। इन्होंने अपनेको सगुण तथा निर्गुण इन दो रूपों में विभाजित किया है। 


    उनमें जो निर्गुण है वह अव्यकरूपमें तथा जो सगुण है, यह महेश्वररूपमें प्रतिष्ठित है। सृष्टिके आदिकालमें उन्हीं महादेवके लि प्रादुर्भूत बीज सर्वप्रथम सागररूपमें व्याप्त मेरी योनिमें गिरा पुनः कालान्तरमें वह बीज स्वर्णके अण्डमें परिवर्तित हो गया। अन्तमें बाबुके द्वारा यह दो भागों विभक्त हो गया। 

    एक खण्डले आकाश तथा दूसरे खण्डसे पृथ्वीका प्रादुर्भाव हुआ। तत्पश्चात् देवाधिदेव हिरण्यगर्भ चतुर्मुख भगवान् ब्रह्मा आविर्भूत हुए।


    जिस प्रकार यह मेरुपर्वत देवलोकके रूप में प्रसिद्ध है, उसी प्रकार उन देवश्रेष्ठ महादेव के इस माह भी प्रसिद्ध समझिये। उनके महान् योग तथा अमित बलको जानकर आपको आगे करके अग्निसदृश प्रभावाले महादेव के निकट खड़ा होकर मैं उनकी स्तुति करूँगा।


    तदनन्तर ब्रह्माको आगे करके भगवान् विष्णु महादेवजी के वेदप्रतिपादित नामांसे स्तोत्रका वाचन अर्थात् स्तुति करने लगे। इक्कीसवें अध्याय में सम्पूर्ण स्तोत्रका पाठ दिया गया है

    । जो प्राणी एकाग्र होकर भक्तिपूर्वक ब्रह्मा तथा विष्णुके द्वारा की गयी इस शिवस्तुतिको कहता है, सुनता है, वह दस हजार अश्वमेधयज्ञका जो फल है, उसे प्राप्त कर लेता है। जो श्राद्धकर्म, देवकर्ममें, यज्ञादि धर्मानुष्ठानोंके बाद किये जानेवाले स्नानके अनन्तर इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।


    उन ब्रह्मा तथा विष्णुको अत्यन्त विनीत भावसे सत्य स्तुति करते देखकर उमापति शिवजीका मुख प्रसन्नता सेप्रफुल्लित हो उठा और उनके मनमें उन दोनों के प्रति अत्यधिक प्रीति उत्पन्न हुई। शिवजीने कहा- आप दोनों लोगों के प्रति मेरे हृदयमें अपार प्रेम है। 


    महाभाग विष्णुने शिवजीसे कहा कि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे अपने प्रति अचल भक्ति प्रदान कीजिये। विष्णुके ऐसा कहनेपर महादेवने उन्हें स्नेहपूर्वक अपने चरणोंमें स्थिर भक्ति प्रदान की। तत्पश्चात् शंकरने ब्रह्मासे कहा- आप समस्त लोकोंके कर्ता हैं, आपका कल्याण हो और आपको यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो। हे सुव्रत ! अब मैं प्रस्थान करता हूँ। इस प्रकार कहकर परमेश्वर भगवान् महादेव अन्तर्धान हो गये।


    पितामह ब्रह्माने प्रजाओंकी सृष्टिको कामनासे भीषण तप करना आरम्भ कर दिया। दीर्घकालतक तपस्या करते हुए उनका जब कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। क्रोधसे युक्त उन ब्रह्माके दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं। उन अश्रुबिन्दुओंसे महाविषधर सर्प उत्पन्न हुए।


     उन सर्पोको देखकर ब्रह्माजीको बड़ी आत्मग्लानि हुई—मेरी तपस्याका मुझे यही फल प्राप्त हुआ कि आरम्भमें ही मेरी लोकविनाशक सर्परूप प्रजा उत्पन्न हुई। अत्यधिक क्रोध तथा अधीरतासे युक्त होनेके कारण ब्रह्माजीको तीव्र मूर्च्छा आ गयी और उस मूछसि आक्रान्त पितामहने अपने प्राण त्याग दिये।


     इसके पश्चात् उन ब्रह्माकी देहसे दीनभावसे रोते हुए ग्यारह रुद्र निकले। रुदन करनेके कारण ही उनका नाम रुद्र पड़ा। सभी प्राणियोंमें स्थित उन रुद्रोंको ही जीवोंके प्राणरूपमें जानना चाहिये। भगवान् शंकरने उत्तम आचरणवाले उन ब्रह्माको पुनः उनके प्राण प्रदान कर दिये।


     प्राण प्राप्तकर भगवान् ब्रह्माने खड़े होकर देवाधिदेव उमापतिको प्रणामकर गायत्रीके ध्यानसे विश्वरूप परमात्मा शिवका दर्शन किया तथा उनसे पूछा- हे विभो । सद्योजात आदि रूपमें आपका प्रादुर्भाव क्यों हुआ? भगवान् शिवने उनका उत्तर देते हुए विभिन्न कल्पों (श्वेतकल्प, लोहितकल्प, पीतकल्प, कृष्णकल्प, विश्वरूपकल्प आदि) का वर्णन किया तथा इन विभिन्न कल्पोंमें उत्पन्न सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर आदि अवतारोंका भी वर्णन प्रस्तुत किया। विस्तार सेइनका वर्णन २३वें अध्याय में प्राप्त है।


     शिवजीके इस प्रकार वर्णन करनेपर भगवान् ब्रह्माने प्रणाम करके रुद्रसे पुनः कहा- जो विद्वान् सर्वव्यापी विश्वात्मा आपकी एवं गायत्रीकी आराधना करे, उसे आप परमपद दें। इसपर शिवजीने कहा- 'ऐसा ही होगा। जो विद्वान् गायत्री तथा भगवान् रुद्रका विश्वरूपत्व जान लेता है, वह ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त हो जाता है।


    सूतजी कहते हैं- प्रजापति ब्रह्माने उन देवाधिदेव शिवजीको प्रणाम करके पुनः उनसे कहा- हे महादेव! व्यक्ति किस तप या ध्यानयोगके द्वारा आपका दर्शन कर पानेमें समर्थ हो सकता है? भगवान् शिव बोले- मानव न तो मुझे केवल तपसे, न आचारसे, न दानसे, न धर्मफलसे, न तीर्थाटनसे, न योगसे, न यज्ञोंसे, न वेदोंके अध्ययनसे, न धनसे और न शास्त्रोंके परिशीलनमात्र से ही देख सकने में समर्थ हैं। मेरा दर्शन ध्यानरहित साधनके द्वारा नहीं किया जा सकता।


    भगवान् शंकरने चौबीसवें अध्यायमें युगक्रमसे मनुसे लेकर श्रीकृष्णद्वैपायनपर्यन्त अट्ठाईस व्यासों तथा अट्ठाईस शिवावतारोंका वर्णन प्रस्तुत करके बताया कि इस कल्पमें जब श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास होंगे, तब वे ही वेदसमूहका विभाग करेंगे।


    रुद्रावतारकी बातें सुनकर भगवान् ब्रह्माने प्रणामपूर्वक महेश्वर शिवकी स्तुति की और पुनः उनसे कहा सभी देवता तथा सभी गण विष्णुसे ही व्याप्त हैं फिर भगवान् विष्णु आपके लिङ्गार्चन में दिन-रात क्यों र रहते हैं तथा जगत्पति होकर भी सदा आपको प्रणाम क्यों करते हैं? 


    भगवान् शंकर उनके इस प्रश्नसे अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्हें लिङ्गपूजाप्रकरणके विषय में बताया। भगवान् विष्णु, सुरश्रेष्ठ इन्द्र तथा मुनियोंने विधिविधानसे लिङ्गकी पूजा करके ही अपने-अपने पद प्राप्त किये हैं। 


    लिङ्गके अर्चनके बिना निष्ठाकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिये जगत्पति भगवान् विष्णु श्रद्धापूर्वक मेरे लिङ्गका पूजन करते हैं।

     ब्रह्माजीसे ऐसा कहकर तथा उनके ऊपर कृपादृष्टि डालकर महेश्वर वहीं पर अन्तर्धान हो गये तथा ब्रह्मा भगवान् शिवको प्रणाम

    करके सृष्टिकी रचना करने में प्रवृत्त हो गये।

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