लिङ्गस्वरूप भगवान् महेश्वर की पूजा का विधि-विधान।।
शिवलिङ्गकी पूजाके पूर्व स्वयं भगवान् शंकरने पवित्रता के लिये स्नानविधि का वर्णन किया है। स्नान तीन प्रकार के बताये गये हैं। सर्वप्रथम जलस्नान करने के बाद भस्मस्नान और फिर मार्जनरूप मन्त्रस्नान करके परमेश्वर की पूजा करनी चाहिये।
स्नान के पूर्व अथवा बाद में पंचगव्यका •पानकर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। तीनों प्रकार के स्नानकी विस्तृत विधि २५वें अध्यायमें प्रस्तुत है।
भावदुष्ट अर्थात् श्रद्धारहित प्राणी जल में स्नान करके तथा भस्म लगा लेने मात्र से शुद्ध नहीं हो पाता, भावना से शुद्ध होने पर ही मनुष्य को पूर्ण शुद्धि प्राप्त होती है
भावदुष्टोऽम्भसि स्नात्वा भस्मना च न शुद्ध्यति । भावशुद्धश्चरेच्छौचमन्यथा न समाचरेत् ॥
नन्दिकेश्वर कहते हैं कि स्नान आदिके अनन्तर भगवती गायत्री का आवाहन, प्राणायाम, सूर्यार्थ्य आदि करना चाहिये। इसके अनन्तर बैठकर अथवा खड़े होकर एक हजार या पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार प्रणव के साथ गायत्री जप नियमपूर्वक करना चाहिये।
इसके अनन्तर देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंके निमित्त तर्पण करने की विधि बतायी गयी है, इसके साथ ही यह भी कहा गया कि पवित्रात्मा द्विज को ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, भूतयज्ञ तथा पितृयज्ञसंज्ञक पंचमहायज्ञों का सम्पादन करना चाहिये। २६वें अध्याय में विस्तारपूर्वक इसका वर्णन प्राप्त है।
२७वें अध्याय में शिवलिङ्गके अर्चनकी विधि प्राप्त है।
त्रिविध - जल, भस्म एवं मन्त्री स्नानकर शुद्ध स्फटिकतुल्य वर्णवाले सभी आभूषणोंसे अलंकृत शिवका ध्यान करना चाहिये। परमकल्याणप्रद 'नमः शिवाय' सूत्रमें समस्त वेद तथा मन्त्र सूक्ष्मरूपमें विद्यमान रहते हैं।
जिस प्रकार वटके बीज में विशाल वट वृक्षका भाव उपस्थित रहता है, उसी प्रकार इस पवित्र सूत्र में महान् ब्रह्म सूक्ष्मरूपसे साक्षात् विराजमान हैं। अतः पूजन में इस मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये।
भगवान् शंकर को पाद्य, अर्घ्य, आचमन एवं स्नान तथा अभिषेक आदि कराकर वस्त्र, यज्ञोपवीत, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, सुगन्धित जल पुनः आचमन, रत्नजटित मुकुट, सुन्दर छत्र, आभूषण तथा ताम्बूल आदि उपचार प्रणवयुक्त मन्त्र से अर्पित करना चाहिये।
इसके बाद शिवलिङ्ग में महादेव का ध्यान करते हुए विधिपूर्वक स्तोत्रपाठ, नमस्कार, नीराजन, पुष्पांजलि अर्पितकर प्रदक्षिणा एवं साष्टांग प्रणाम करना चाहिये। इसके अनन्तर 'देवाधिदेव शिव मुझमें समाहित हैं'- ऐसी भावना करे।
भगवान् महेश्वरके आभ्यन्तर पूजन का स्वरूप महेश्वर ध्येय हैं, उनका चिन्तन ही ध्यान है, मोक्ष ही जीवन का प्रयोजन है— इन तथ्योंको भलीभाँति जानने वाला ही शिवको प्राप्त कर सकता है-
'ध्येयो महेश्वरो ध्यानं चिन्तनं निर्वृतिः फलम्। प्रधानपुरुषेशानं याथातथ्यं प्रपद्यते॥'
(श्रीलिङ्गमहापुराण पू० २८।६) भगवान् शंकर जगत्के परम कारण विश्वात्मा तथा विश्वरूप कहे गये हैं। ब्रह्म अर्थात् रुद्रका पर्याय आनन्द है, इस सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्म अर्थात् शिवसे व्याप्त समझकर उन्हींका ध्यान तथा चिन्तन करना चाहिये।
जिस पुरुष के लिये कुछ भी करने के लिये शेष नहीं है, उस परम संतुष्ट पुरुष की चिन्ता ब्राह्मी चिन्ता है, इसमें सन्देह नहीं है। इस प्रकार आभ्यन्तर पूजन करने वाले पुरुष नमस्कार आदि के द्वारा सदा पूजनीय हैं, इनकी कभी निन्दा नहीं करनी चाहिये।
वर्णाश्रम में रहनेवाले पुरुषों को चाहिये कि वे वर्णाश्रम से अतीत ब्रह्मवेत्ताओं की सदा सेवा करें तथा उन्हें नमस्कार करें।

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